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आईएएस टीना डाबी को मिली उधार की मुस्कान, तलाक के बाद अब 20 अप्रैल को करेंगी अधेड़ से शादी।

नेशनल न्यूज-

टीना डाबी जिस कदर मीडिया माध्यमों पर छाई हुई हैं, उससे लगता है कि ये मामला रूस-यूक्रेन युद्ध और कोरोना संक्रमण से भी ज्यादा बड़ा और गंभीर है। टीना डाबी कौन हैं, एक आईएएस, एक सुंदर लड़की, ऐसी लड़की जिसने कई बेड़ियों को एक झटके में तोड़ते हुए अपने मुसलमान प्रेमी से शादी की थी। या फिर एक ऐसी लड़की जो अब एक अधेड़ आईएएस से दोबारा शादी करने जा रही है और सोशल मीडिया पर लिखती है, ‘‘ये मुस्कान तुम्हारी दी हुई है।’’ और एक ऐसी लड़की भी जिसने बहुत कम उम्र में आईएएस जैसी परीक्षा टॉप करके उम्मीदों के एक नए आसमान को सामने रखा था, लेकिन अब वो सब कुछ कहां है ? वो सफलता कहां है ?, वो उम्मीदें कहां हैं ?, वो स्त्री आजादी और बराबरी की मॉडल कहां है ? जवाब कठिन है और जटिल भी है। लेकिन, जवाब मौजूद है।
जवाब देने से पहले कुछ बातों को साफ करना जरूरी है। निजी तौर पर मुझे इस बात से कोई दिक्कत नहीं है कि कोई लड़की किससे प्रेम करती है और किससे शादी करती है या उसकी निजी जिंदगी क्या है! मुझे इससे भी कोई दिक्कत नहीं है कि कोई लड़की सुंदर है या सुंदर नहीं है और मेरी टिप्पणी के केंद्र में यह बात भी नहीं है कि टीना डाबी किसी दलित परिवार से हैं या नहीं हैं। मूल बात यह है कि एक सुंदर आईएएस लड़की जो अपने मुसलिम पति से तलाक लेकर अब एक अधेड़ आईएएस से शादी करने जा रही है, उसका मैसेज क्या है ?
बात स्पष्ट है कि टीना टाबी से जुड़ा काम्बीनेशन मीडिया और बाजार को एक जरूरी ‘उत्पाद’ मुहैया कराता है। इसलिए मीडिया और मीडिया के माध्यम से बाजार ने टीना डाबी के मामले को तुरंत लपक लिया। बाजार की ताकतें इतनी शातिर और दबंग हैं कि किसी सचेत और प्रबुद्ध व्यक्ति को भी बहुत आसानी से ‘उत्पाद‘ में तब्दील कर देती हैं। उत्पाद यानि प्रॉडक्ट बनाने की प्रक्रिया भी सुनिर्धारित है। जिसे प्रॉडक्ट के तौर पर तब्दील करना हो, सबसे पहले उसकी खूबियों, भले वे उसमें हों या न हों, को प्रचारित किया जाता है। इसी क्रम में उसकी प्रॉडक्ट-वैल्यू स्थापित की जाती है। लोगों के बीच चर्चा होती है और वे संबंधित प्रॉडक्ट की ओर आकर्षित होते हैं। इसी से बाजार अपने लिए रेवेन्यू और पूंजी एकत्र करता है।
अब टीना टाबी के उदाहरण को देखिए। हमारे सिस्टम के लिए उसकी मौजूदगी और उपयोगिता एक अच्छा सिविल सर्वेंट साबित होना है। बीते छह साल में टीना टाबी ने एक अधिकारी के तौर पर कोई ऐसा काम किया हो जिससे आम लोगों की जिंदगी में उल्लेखनीय बदलाव आया हो या देश का नाम पूरी दुनिया में रौशन हुआ हो या दलित समाज के लिए अपने किसी कार्य से कोई दुर्लभ उदाहरण स्थापित किया हो, इन सबके बारे में कोई सार्वजनिक सूचना उपलब्ध नहीं है। इसके उलट टीना टाबी की निजी जिंदगी ही चर्चा में है, जिसका वे खुद भी प्रचार करती हैं।
किसी एक परीक्षा में टॉपर होना, चाहे वह आईएएस की परीक्षा ही क्यों न हो, इस बात का प्रमाण नहीं है कि संबंधित व्यक्ति अच्छा प्रशासक या अच्छा इंसान भी साबित होगा ही। टीना टाबी को एक व्यक्ति की बजाय एक प्रवृत्ति की तरह भी देख सकते हैं जिसके विकास में समकालीन सामाजिक परिस्थितियों और बाजार का प्रभाव साफ-साफ देखा जा सकता है। और यही प्रवृत्ति टीना टाबी और विश्व सुंदरी हरनाज कौर को एक ही श्रेणी में रख देती है। हम जश्न मनाते हैं कि भारत की एक लड़की विश्व सुंदरी बनी है। इसके कुछ ही महीनों बाद मीडिया में हरनाज कौर के शारीरिक अंगों के असामान्य विकास (जो किसी बीमारी के कारण है) पर चर्चा होने लगती है। सोशल मीडिया पर चटखारे लेकर चर्चा की जाती है कि हरनाज कौर के स्तन और नितंब कितने बड़े हो गए हैं। (जबकि, बाजार ने वादा किया था कि उनके शरीर का हर अंग परफेक्ट शेप में रहेगा, जिनकी नाप-जोख विश्व सुंदरी बनने की प्रक्रिया के दौरान ही जाती है!)
मूल बात देखिए, जिस वक्त हरनाज को भारत की बेटी, देश का गौरव बताया जा रहा था, तब भी हम उसे शरीर के तौर पर ही जानते थे और जब उसके स्तनों, नितंबों के असामान्य आकार को लेकर गॉसिप किए जा रहे हैं तब भी हम उसका शरीर ही देख रहे हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि हम बाजार द्वारा तैयार एक प्रॉडक्ट ही देख रहे हैं। यही बात ज्यों की त्यों टीना टाबी पर भी लागू होती है। चिंता की बात यह है कि ये लड़कियां (इनका नाम टीना टाबी, हरनाज कौर या अन्य कुछ भी हो सकता है) केवल बाजार के कारण ही उत्पाद में तब्दील नहीं हुई हैं, बल्कि इनकी निजी महत्वाकांक्षा और तत्काल शोहरत पा लेने की चाहत भी इन्हें मौजूदा स्थिति में लाकर खड़ा कर देती है। इस वक्त मीडिया जिस तरीकों और उत्पादों के जरिये अपने दर्शकों-पाठकों को बांधे रखना चाहता है, उन तरीकों और उत्पादों में हरनाज कौर के साथ-साथ टीना टाबी भी पूरी तरह अनुकूल साबित होती हैं। हालांकि, हरनाज कौर को एक बार अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन टीना टाबी को उसके पेशेगत दायित्वों के कारण अनदेखा करना आसान नहीं है और किया भी नहीं जाना चाहिए।
इस वक्त देश के प्रतिष्ठित ऑनलाइन मीडिया माध्यमों पर ऐसी खबरों की भरमार है जो देश की सबसे सुंदर आईएएस, देश की सबसे सुंदर आईपीएस के ब्यौरों से भरी हुई हैं। बी. चंद्रकला का उदाहरण भी कुछ दिन पुराना ही है। क्या हम सबसे सुंदर आईएएस, सबसे सुंदर आईपीएस, सबसे सुंदर विधायक की तलाश में हैं। अगर मीडिया की निगाह से देखें तो हम इनकी तलाश में हैं। इसलिए हमें वे लड़कियां प्रायः प्रभावित नहीं करतीं जो अच्छी प्रशासक, अच्छी डॉक्टर या अच्छी अधिकारी तो हैं, लेकिन न तो वे सुंदर हैं और न ही उत्पाद बनने के लिए तैयार हैं।
अगर अपनी सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय जरूरतों को देखें तो हमें सुंदरता और निजी जिंदगी के किस्सों की बजाय उस टीना टाबी की जरूरत है जो अपने दलित समाज, जो अपने स्त्री-वर्ग और अंतत सुव्यवस्था का परचम थामे हो, न कि नकली मुस्कान वाली वो लड़की जो सोशल मीडिया पर भावुक टिप्पणी करती है कि ‘‘मेरी ये मुस्कान तुम्हारी दी हुई है।’’ यदि टीना टाबी की मुस्कान भी किसी की बंधुवा है या किसी की उधार दी हुई है तो फिर उन्हें सच में सोचना चाहिए कि वीमेन-एंपावरमेंट एक फर्जी अवधारणा है। टीना टाबी का उदाहरण ये भी बताता है कि आईएएस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा को टॉप करने के बावजूद किसी की सामाजिक चेतना का विकास प्रेरक दिशा में ही होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। यकीनन, टीना टाबी हमारे सामाजिक खोखलेपन और दोहरी सोशल-पर्सनालिटी का सशक्त उदाहरण है।

लेखक — वरिष्ठ पत्रकार, डॉ सुशील उपाध्याय

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